International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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आपहुंदरी: स्वतंत्र-लेखन का स्त्री विमर्श

Author(s) Jyoti Sharma
Country India
Abstract आत्मकथा लेखन का अर्थ ही है- सत्य की कसौटी पर खरा उतरना, जीवन में घटित तमाम घटनाओं को सत्य के तराजू पर तोलते हुए वर्णित करना और जब यह वर्णन कोई महिला बड़ी बेबाकी के साथ, सभी वर्जनाओं को तोड़ कर करती है तो एक क्रांति का उद्भव होता है। ऐसा उद्भव देखने को मिलता है जब बीसवीं सदी के अन्तिम दशक पर मौन तोड़ती स्त्रियाँ दुर्गम राहों से गुजरतें हुए पढ़ लिखकर साहित्यकार बनती है। इनमें से कुछ ऐसी साहसिक स्त्रियाँ भी हुई है जो अपने जीवन के संघर्ष, पीडा, अन्याय, शोषण के साथ-साथ स्त्री-अस्तित्व, स्त्री-अधिकार स्त्री-स्वतंत्रता को आत्मकथा-साहित्य के माध्यम से बयां कर एक नई जमीन तैयार कर रही हैं। हिन्दी साहित्य में अनेक आत्मकथाएँ साहित्यिक पटल पर उभर रही हैं, इनमें प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, मन्नू भण्डारी, सुषम बेदी इत्यादि महत्त्वपूर्ण है। उक्त सभी आत्मकथाएँ अपने समय और समाज की सच्चाई का आईना तो दिखाती हैं साथ ही साथ स्त्री-उत्पीड़न पर आवाज भी उठाती हैं। उसी कड़ी में रमणिका गुप्ता भी आती हैं। जिनकी आत्मकथा ‘आपहुंदरी’ के माध्यम से स्त्री विमर्श को एक नई जमीन देने और सवालों का सिलसिला जो सोचने को मजबूर करता है, को इस प्रपत्र के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया गया है।
Keywords आपहुंदरी, वर्चस्व, आस्तित्व, बलात्कार, स्त्री-उत्पीड़न
Field Arts
Published In Volume 6, Issue 3, May-June 2024
Published On 2024-06-08
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2024.v06i03.22413
Short DOI https://doi.org/gtzjjs

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